अमेरिका-भारत संबंधः 21वीं सदी की स्थायी साझेदारी का निर्माण

भारत में अमेरिकी राजदूत केनेथ आई. जस्टर का भाषण

बहुत धन्यवाद, राजा। इस दयालु और उदारतापूर्ण परिचय कराने के लिए। और इस कार्यक्रम के लिए कठिन परिश्रम करने के लिए  कारनेगी इंडिया में आपके साथियों तथा अमेरिकी दूतावास में मेरे साथियों को भी धन्यवाद। निश्चित रूप से आज दोपहर यहां उपस्थित सभी लोगों को धन्यवाद। भारत में अमेरिकी राजदूत के रूप में अपने उद्घाटन संबोधन के लिए आज यहां आपके साथ होना एक सम्मान की बात है।

मुझे 2001 से भारत के साथ अमेरिकी संबंधों के लिए सरकार और निजी क्षेत्र दोनों के साथ कार्य करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। इस समय के दौरान और पहले भी, मैं प्रायः भारत के प्राचीन इतिहास और समृद्ध संस्कृति से आश्चर्यचकित रहा हूं। सिंधु घाटी सभ्यता, जो लगभग 5,000 वर्ष पूर्व विकसित हुई थी जिसमें दुनिया के पहले योजनाबद्ध शहरों की रूपरेखा प्रस्तुत की गई है। इस सभ्यता ने उपमहाद्वीप की एक असाधारण कहानी का शुभारंभ किया जिससे बड़े धर्मों, शास्त्रीय भाषाओं को जन्म हुआ और अन्य के साथ-साथ विज्ञान, कला, और साहित्य के क्षेत्रों में असंख्य योगदान किए हैं।

अब, जैसे कि राजदूत के रूप में अपनी यात्रा का आरंभ किया है, मैं आपके साथ और अपने भारतीय मित्रों के साथ 21वीं सदी में और आगे पड़ने वाले हमारे संबंधों के प्रभाव के बारे में बातचीत करना चाहूंगा। मैं जो विचार प्रस्तुत करता हूं वह आपके सहयोग के साथ पूर्ण होंगे। अतः मुझे आपकी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

भारत का एक मित्र

शुरुआत में ही मैं स्वीकार करता हूं कि अमेरिकी राजदूत नामित होने के बहुत फायदे हैं। विशेषकर, जीवन के सभी पहलुओं के साथ-साथ जिन लोगों से मैं कभी नहीं मिला, मेरे बारे में आश्चर्यजनक बातें बताने के लिए सामने आए हैं। हालांकि यह सभी सच नहीं भी हो सकता है, लेकिन निश्चत रूप से अच्छा लगता है!

जब मैंने अपना परिचय-पत्र प्रस्तुत किया तब भारत के राष्ट्रपति द्वारा एक प्रशंसा जो मेरे साथ गूंजती रहती हैः उन्होंने मुझे ‘‘भारत के मित्र’’ कहा। यह एक ऐसी टिप्पणी है, जिसे अन्य ने भी किया है, उसे मैं बड़ा सम्मान मानता हूं। ‘‘भारत के मित्र’’ का क्या अर्थ है और मैं यह क्यों सोचता हूं कि यह महत्वपूर्ण है, इसे पर मैंने विचार किया है।

जब मैंने सबसे पहले नीति संबंधी मामलों पर अंडर सेक्रेटरी ऑफ कॉमर्स के रूप में भारत के साथ कार्य करना शुरू किया, हमारे दोनों देशों ने संवेदनशील अमेरिकी तकनीक का सैनिक और पारंपरिक अनुप्रयोगों दोनों के साथ हस्तांतरण संबंधी चुनौतीपूर्ण और कठिन मामलों का सामना किया, जो तथाकथित ‘‘दोहरे उपयोग के आइटम्स’’ हैं। भारत ने इस तकनीक तक पहुंच बढ़ाने की मांग की, जबकि अमेरिका सुनिश्चित करना चाहता था कि किसी भी हस्तांतरण का उपयोग केवल सहमति के प्रयोजनों के लिए नामित प्राप्तकर्ताओं के द्वारा किया जाएगा। इसके लिए एक निर्यात नियंत्रण की एक अत्याधुनिक प्रणाली की अवश्यकता होती है – जो स्पष्ट रूप से उस समय भारत के पास नहीं थी।

इस विषय पर हमारा आरंभिक आदान-प्रदान बहुत औपचारिक था और व्यापक खाड़ी में हमारी स्थितियों के कारण कुछ हद तक तनावपूर्ण था। हालांकि, हमने भरोसा पैदा करने और आगे बढ़ने के लिए जल्दी ही पारस्परिक कदमों की एक श्रृंखला बनाई। और देखें हम कितनी दूर आ गए। अब, भारत हमारे चार बहुपक्षीय निर्यात नियंत्रण व्यवस्थाओं में से दो- दोहरे उपयोग की वस्तुओं पर वासेनार अरेंजमेंट जिसमें भारत अभी हाल ही में शामिल हुआ है और मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रेजीम के साथ अपनी सदस्यता का लाभ ले रहा है। हम यह भी उम्मीद करते हैं कि भारत निकट भविष्य में रासायनिक और जैविकीय हथियारों के आस्ट्रेलिया ग्रुप में शामिल हो जाएगा। और हम परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह में भारत की सदस्यता सुनिश्चित करने के लिए भारत तथा हमारे अंतर्राष्ट्रीय साझेदारों के साथ निकटता से कार्य कर रहे हैं। इसके साथ-साथ अमेरिका दोहरे उपयोग की वास्तुओं के भारत को निर्यात संबंधी प्रतिबंधात्मक नीति से अलग अधिक उदार हो गया है।

मेरे विचार से जिस तरह से अमेरिका और भारतीय अधिकारियों ने इस हस्तांतरण के लिए संपर्क किया उसने कुछ को मुझे ‘‘भारत का एक मित्र’’ कहने के लिए प्रेरित किया। मैं इस दृष्टिकोण को संक्षेप में बताता हूं।

इसकी शुरुआत सदैव की भांति सम्मान के साथ हुई है। हालांकि अमेरिका और भारतीय राजनयिक निश्चित रूप से अपने-अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार कार्य शुरू करते हैं, हमने भी एक-दूसरे को ध्यान से सुना, एक-दूसरे के दृष्टिकोण को समझने का प्रयास किया, और समानताओं तथा परस्पर लाभकारी समाधानों की तलाश की है।

हमने एक-दूसरे पर भरोसा किया है। इसमें खुलापन और स्पष्टता है। ‘‘आप जैसा कहते हैं वैसा करो और जैसा करते हो वैसा कहो’’  यह पुरानी कहावत हो सकती है, लेकिन भरोसा पैदा करना महत्वपूर्ण है।

निश्चित रूप से, हम समय-समय पर असहमत हुए हैं। लेकिन मित्र के रूप में हम अभी भी एक-दूसरे को स्वीकार करते हैं, क्योंकि हमारे बहुत से मूलभूत हित समान हैं। इस स्वीकृति ने हमें असहमति के मध्य कार्य करने में समर्थ बनाया है और द्वेष व विद्रोह के बिना तथा निश्चित रूप से अपने रिश्ते को खतरे में डाले बिना अग्रसर हुए हैं।

हमारे दृष्टिकोण की एक और महत्वपूर्ण विशेषता थी आत्मविश्वास। क्योंकि मित्र एक-दूसरे के अच्छे इरादों में विश्वास करते हैं, हमने कभी-कभी खतरा उठाते समय आत्मविश्वास का अनुभव किया -यहां तक कि बड़े खतरे में भी, जिसने हमें अंततः वांछित लक्ष्य तक पहुंचने में सहायता की।

और आखिरकार, हमने लचीलापन और स्थिरता दिखाई। हमने बड़े उद्देश्य की सराहना की तथा निराशाओं या असफलताओं से पीछे मुड़कर नहीं देखा जो अनिवार्य रूप रास्ते में आए। हमने जैसे को तैसा का व्यवहार करके अपने आपको संकुचित नहीं होने दिया। इसने हमें मजाकिया स्वभाव बनाने में अवश्य मदद की।

हमे जो सफलता मिली उसके लिए यह विशिष्टताएं- सम्मान, भरोसा, स्वीकृति, आत्मविश्वास, और लचीलापन और स्थिरत महत्वपूर्ण थीं। यह हमारे लोगों के बीच संबंधों का स्वाभाविक हिस्सा हैं, शायद इसका सबसे अच्छा उदाहरण अमेरिका में विशाल प्रवासी भारतीयों ने प्रस्तुत किया है, जो पूरी तरह अमेरिकी जीवन से जुड़े हैं और अभी भी भारत के साथ निकट संबंध रखते हैं। भारतीय उद्यमियों ने, विशेष रूप से हमारी दोनों संस्कृतियों को जोड़ा है और अमेरिकी प्रौद्योगिकी के भूपटल पर महत्वपूर्ण छाप अंकित की है, जबकि भारत भी लाभान्वित हो रहा है।  आज सभी प्रवासियों ने अमेरिका में स्टार्टअप्स स्थापित किए हैं इनमें से लगभग 33 प्रतिशत भारतीयों के हैं। यह प्रतिशत किसी भी अन्य समूह से अधिक है। निश्चित रूप से भारतीयों और अमेरिकियों के बीच पारस्परिक आदान-प्रदान के मानवीय आकार ने इन अविश्वसनीय आंकड़ों में योगदान किया है।

यह मेरी आशा है जैसे कि हम अपनी रणनीतिक भागीदारी की संभावनाओं को पूरा करना चाहते हैं, हमारे दोनों देशों के सरकारी अधिकारी नियमित बातचीत करेंगे, यही भावना और प्रेरणा राष्ट्रपति ट्रंप और प्रधानमंत्री मोदी के बीच प्रतिबद्धता में भी परिलक्षित हुई है।

हमारे मूल्य और हित

विविधता, गतिशीलता, बहुधार्मिकता, और बहुतलतापूर्ण लोकतंत्रों के सदस्य के रूप में भारतीयों और अमेरिकियों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मूलभूत मूल्यों का साझा करते हैं, कठिन परिश्रम और उद्यम, मुक्त समाज, मानवाधिकार, और कानून का शासन। केवल फायदे के बजाय, यह मूल्य दृढ़ विश्वास की मित्रता का आधार हैं। हमारे मूल्यों के आधार पर नियमानुसार कार्य करने, व्यापार और वाणिज्य की स्वतंत्रता का लाभ उठाने तथा अंतर्राष्ट्रीय कानून के अनुसार विवादों का हल शांतिपूर्ण ढंग से करने में हमारे हित समान हैं।

हिंद-प्रशांत क्षेत्र

हमारे साझा मूल्य और समान हित हिंद-प्रशांत क्षेत्र के लिए हमारे विजन की जानकारी देते हैं। यह क्षेत्र दुनिया की विशालतम तथा सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और सर्वाधिक जनसंख्या वाले देशों का क्षेत्र है। इस क्षेत्र के समुद्र में वैश्विक व्यापार के लिए बहुत से महत्वपूर्ण अवरोध हैं। यह क्षेत्र भौगोलिक रूप से प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध है तथा तेजी से विकसित होती अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली के आकर्षण का केंद्र बन रहा है।

अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति मानती है कि भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र में और उससे भी आगे ‘‘एक प्रमुख शक्ति’’ है। भारत और अमेरिका के लिए हिंद-प्रशांत हमारे लोगों के साथ-साथ अन्य की भी सुरक्षा और समृद्धि के लिए महत्वपूर्ण है। हम मिलकर करना चाहते हैं :

  • स्वतंत्र और खुला क्षेत्र सुनिश्चित करना चाहते हैं, जिसमें कानून का शासन और लोकतांत्रिक सिद्धांत नियम-आधारित व्यवस्था में झलकते हैं;
  • सार्वभौमिकता और क्षेत्रीय अखंडता के सम्मान को प्रोत्साहन देना चाहते हैं;
  • नौपरिवहन की स्वतंत्रता, ओवरफ्लाइट, और वाणिज्य, तथा समुद्र के अन्य वैध उपयोग की गारंटी चाहते हैं;
  • क्षेत्रीय और समुद्री विवादों का शांतिपूर्ण समाधान, अंतर्राष्ट्रीय कानून के अनुसार सुनिश्चित करना चाहते हैं;
  • निजी क्षेत्र के अगुवाई वाले विकास के माध्यम से आर्थिक संपर्क, स्वतंत्र और निष्पक्ष व्यापार, जिम्मेदार वित्तीय-ऋण परंपराओं का उपयोग, और आधारभूत ढांचे के पारदर्शी विकास को बढ़वा देना चाहते हैं; और
  • क्षेत्रीय स्थायित्व और सुरक्षा का संरक्षण, जनसंहार के हथियारों के प्रसार की रोकथाम, और आतंकवाद के अभिशाप को समाप्त करना चाहते हैं।

अमेरिका-भारत रणनीतिक भागीदारी

अमेरिका-भारत रणनीतिक भागीदारी की रूपरेखा दोनों देशों को मजबूत करने तथा इस क्षेत्र पर लाभकारी प्रभाव के लिए बनाई गई है। अभी जो सिद्धांत गिनाए गए हैं वह इसमें सम्मिलित हैं तथा इन्हें अपनाने वाले किसी राष्ट्र के साथ कार्य करने का स्वागत है।

गत 17 वर्षों में अमेरिका और भारत ने मिलकर बहुत प्रगति की है। इसमें हमारा रक्षा सहयोग और संयुक्त सैन्य अभ्यास, उच्च प्रौद्योगिकी सहयोग समूह का कार्य रणनीतिक भागीदारी में अगला कदम, ऐतिहासिक नागरिक परमाणु समझौता, अमेरिका-भारत व्यापार में लगभग छह-गुणा वृद्धि, रक्षा प्रौद्योगिकी और व्यापार योजना तथा भारत को बड़े रक्षा भागीदार के रूप में नामित करना, और वाणिज्य संबंधी बहुत सी अन्य योजनाएं, ऊर्जा, पर्यावरण, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य, और अन्य क्षेत्र शामिल हैं। गौरतलब है कि सरकार के कई बदलावों में हमारे प्रत्येक देश के बड़े पक्षों की ओर से मजबूत, दृढ़ और निरंतर सहयोग रहा है।

और अभी, इस सबके बावजूद, हमसे अभी भी पूछा जाता है, ‘‘क्या अमेरिका एक भरोसेमंद भागीदार है जो इस क्षेत्र में कार्य करता रहेगा?’’ या ‘‘हमारे संबंध को आगे बढ़ाने के लिए आगामी प्रमुख योजना क्या होगी?’’ हालांकि यह प्रश्न अनुचित हैं, फिर भी वे चिंता के प्रतीक हैं और हमें उसे दूर करना होगा। जब हम इस भागीदारी के प्रति परस्पर प्रतिबद्धता पर संदेह करना बंद कर देते हैं और इसके महत्व को सिद्ध करने के लिए अन्य योजना की तलाश बंद कर देते हैं, तब वास्तव में हमें पता चलता है कि चीजें सही तरह से आगे बढ़ रही हैं।

गत 17 वर्षों की समीक्षा में मैं मानता हूं कि हमने रणनीतिक भागीदारी के लिए मजबूत नींव रखी है जिसका महत्वपूर्ण, सकारात्मक प्रभाव 21वीं सदी और आगे हो सकता है। यह समय इस नींव पर उदार लेकिन उद्देश्यात्मक तरीके से निर्माण करने का है। हमें अपने बढ़ते दुखों से आगे जाना होगा और दीर्घकाल में हम दोनों के लिए उचित की रचना करनी होगी — इस क्षेत्र के लिए कुछ ऐसा जो स्थायी संरचना को आकार देने में मदद करता है।

यह समय सुनिश्चित करने का है कि रणनीतिक भागीदारी एक मजबूत भागीदारी है। अमेरिका की लंबे समय से मुक्त, सुरक्षित, और खुला हिंद-प्रशांत की प्रतिबद्धता ने हम सभी के लाभ के लिए इस क्षेत्र में स्थायित्व और उल्लेखनीय आर्थिक उन्नति को मजबूत बनाया है। अमेरिका इस क्षेत्र के प्रति प्रतिबद्ध रहेगा, क्योंकि हम नियम आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था हैं, क्योंकि हमारा भविष्य इसके साथ अटूट रूप से जुड़ा है। इस उद्यम में अपने साथ भारत के नेतृत्व का स्वागत करते हैं। सेक्रेटरी ऑफ स्टेट टिलरसन के शब्दों में हिंद प्रशांत शांति, स्थायित्व का क्षेत्र है और समृद्धि का विकास हो रहा है, न कि विकृत, सघर्ष और शिकारी आर्थिक नीति का। इसे सुनिश्चत करने के लिए एक भागीदार के रूप में दृढ़-निश्चय के आधार और क्षेत्रीय निर्माण पर समान विचार वाले देशों के साथ कार्य करें।

मैं पांच स्तंभों के बारे में संक्षिप्त रूप से बताता हूं जो हमारी मजबूत भागीदारी के लिए रूपरेखा प्रदान कर सकते हैं।

रक्षा और आतंकवाद से मुकाबला

पहला मुख्य स्तंभ है हिंद-प्रशांत क्षेत्र की दीर्घकालिक सुरक्षा और स्थायित्व को बढ़ाने के लिए रक्षा पर हमारा सहयोग तथा आतंकवाद से मुकाबला। इसका एक संबद्ध और समान रूप से महत्वपूर्ण उद्देश्य भारत को क्षेत्रीय सुरक्षा के तंत्र प्रदाता, शांति के खतरे, विशेष रूप से भारतीय समुद्र और इसके आसपास के खतरे से सफलतापूर्वक निपटने में सक्षम बनाने के लिए सहयोग जारी रखना है।  हम इस उद्देश्य को कई तरह से आगे बढ़ा सकते हैं, जिसके लिए हम गर्मियों नई 2+2 मंत्रिस्तरीय बातचीत की अपेक्षा करते हैं और दोनों तरफ से कार्यवाही के लिए रोडमैप शामिल करने की आशा है।

सहयोग बढ़ाने का एक तरीका है सैन्य अभ्यास। भारत और अमेरिका पहले ही द्विपक्षीय अभ्यासों की विशाल श्रृंखला संचालित कर रहे हैं। हालांकि यह वास्तव में सिंगल-सर्विस रही हैं, यह समय शायद मानवीय सहायता और आपदा राहत पर केंद्रित बहु-सेवा अभ्यास पर विचार करने का है। सैन्य अभ्यासों का मामूली विस्तार दोनों देशों को एक-दूसरे से सीखने और एक साथ कार्य करने में सुविधा, सरलता और आत्मविश्वास बढ़ाता है।

सहयोग के दूसरे प्रमुख क्षेत्र में सैनिक हार्डवेयर और टेक्नोलॉजी शामिल है। एक दशक से भी कम समय में अमेरिकी रक्षा व्यापार शून्य से 15 बिलियन डॉलर से अधिक हो गया है, इसमें अमेरिका के कुछ सबसे आधुनिक सैनिक उपकरण की बिक्री भी शामिल है। हम इस रुझान को जारी देखना चाहते हैं, क्योंकि भारत की रक्षा जरूरतें बड़ी है, तथा अमेरिका वैश्विक लीडर के रूप में आधुनिक सैनिक प्रौद्योगिकी विकसित कर रहा है, भारतीय सुरक्षा को बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है। इस प्रतिबद्धता का एक प्रमुख उदाहरण था, गत जून में ट्रंप प्रशासन द्वारा सी गार्डियन मानव रहित एरियल सिस्टम की बिक्री की स्वीकृति देना। इस आधुनिक प्लेटफॅार्म को हासिल करने वाला भारत हमारा पहला गैर-नाटो भागीदार या संधि सहयोगी होगा।

भारत की अपने ही देश में उपकरणों के उत्पादन की इच्छा के अनुरूप, मैं इस बात पर जोर देना चाहता हूं कि अमेरिका मात्र आपूर्तिकर्ता से अधिक है। बड़ी अमेरिकी रक्षा कंपनियां जटिल रक्षा प्रणालियों के लिए उपकरणों का उत्पादन भारत में कर रही हैं। इसके अलावा हमारी रक्षा प्रौद्योगिकी और व्यापार योजना तथा अमेरिका द्वारा भारत को बड़े रक्षा भागीदार के पद ने हमारे रक्षा सहयोग को मजबूत बनाया है। इसमें सहविकास और सहउत्पादन सम्मिलित है। हम भारत के स्वदेशी रक्षा बेस और क्षमताओं के निर्माण के प्रयासों में मदद करने के साथ-साथ हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बड़े रक्षा भागीदार के रूप में दोनों सेनाओं के अंतर-संचालन को भी बढ़वा देना चाहते हैं।

रुचियों का मेल इन योजनाओं की भावी सफलता का आधार है- भारत सरकार की प्रौद्योगिकी और सैन्य उपकरणों के सह-विकास और सह-उत्पादन में रुचि; अमेरिकी सरकार की सूचना और प्रौद्योगिकी की सुरक्षा में रुचि; हमारी सेनाओं के अंतर-संचालन में परस्पर रुचि; और दोनों देशों में हमारी कंपनियों की रोजगार बढ़ाने और पैदा करने में साझा रुचियां। यह रुचियां कभी भी पूरी तरह से समान नहीं होंगी, और बोझ केवल एक पक्ष या दूसरे पक्ष नहीं पर पड़ेगा। लेकिन, जैसा कि पहले दोहरे उपयोग की प्रौद्योगिकी के लिए किया था, सभी पक्षों को समानताओं और परस्पर लाभकारी समाधानों का पता करने में रचनात्मक होने की आवश्यता है, ताकि इस प्रक्रिया के फायदे प्राप्त कर सकें।

हमें सभी मुद्दों को एकदम हल होने की अपेक्षा करने के बजाय इन रक्षा योजनाओं पर धैर्यपूर्वक कदम-दर-दम आगे बढ़ने की जरूरत है। यह ध्यान में रखते हुए, शायद अगामी वर्ष में हम गुप्तचर, निगरानी, और टोली प्लेटफॉर्म्स जैसे क्षेत्रों में सहयोग करने के बड़े समझौतों की घोषणा कर सकते हैं; इनमें युद्धक विमान उत्पादन; और अगली पीढ़ी की प्रणाली जिसमें फ्यूचर वर्टीकल लिफ्ट प्लेटफार्म या एडवांस टेक्नोलॅाजी ग्राउंड कम्बैट व्हीकल शामिल हैं।

रक्षा सहयोग को बढ़ाने का तीसरा तरीका है सैनिक आदान-प्रदान। हमारा अनुभव दर्शाता है कि यह आदान-प्रदान गुणात्मक रूप से मेलजोल बढ़ाते हैं तथा संबंध विकास पर आधारित भरोसे का निर्माण करते हैं तथा कक्षाओं व अन्य स्थानों में विकसित होते हैं। समय के साथ हमें युद्ध विद्यालयों और हमारे प्रशिक्षण संस्थानों में अधिकारियों का आदान-प्रदान, यहां तक कि अपने-अपने लड़ाकू कमांड पर पारस्परिक सैन्य संपर्क अधिकारियों का आदान-प्रदान बढ़ाना चाहिए।

इस स्तंभ के संबंध में एक अंतिम अति महत्वपूर्ण स्तंभ है- आतंकवाद से मुकाबला करने में हमारा खास और बढ़ता सहयोग। हमारे प्रत्येक देश भयावह आतंकी हमलों से पीड़ित हैं और उन्हें लक्ष्य बनाना जारी है। अपने समाज से इस खतरे को समाप्त करने में हमारे मजबूत आपसी हित है। राष्ट्रपति ट्रंप और अन्य अमेरिकी नेताओं ने स्पष्ट किया है कि हम सीमापार के आतंकवाद या आतंकवादियों के सुरक्षित ठिकानों को सहन नहीं करेंगे। इस प्रयत्न के हिस्से के रूप में हमने पिछले महीने पहली बार अमेरिका-भारत काउंटरटेरोरिज्म डेजिग्नेशन डायलॉग की शुरुआत की है। हमें जानकारी साझा करने को और बढ़ावा देने, आतंकवादियों की जांच और नामजद करने, वित्तीय अपराधों तथा उनके नेटवर्क से लड़ना जारी जारी रखने, तथा क्षेत्रीय और वैश्विक दोनों ही आतंकी शिविरों और संचालनों को ध्वस्त करने तथा उन्हें रोकना जारी रखने की आवश्यकता है।

आर्थिक और वाणिज्यिक संबंध

अब मैं रणनीतिक भागीदारी बनाने के दूसरे स्तंभ- आर्थिक और वाणिज्यिक संबंध पर आते हैं। भारत आर्थिक विकास के मध्य में है जैसेकि वैश्विक अर्थव्यवस्था में पूरी तरह एकीकृत हो रहा है। परिणामस्वरूप भारत के साथ अमेरिकी व्यापार और निवेश संबंध विकसित हो रहे हैं। द्विपक्षीय व्यापार 2001 में 20 बिलियन डॉलर से बढ़कर 2016 में 115 बिलियन डॉलर हो गया है। बेशक हमारे बाजारों का जो आकार दिया गया है उनमें वस्तुओं और सेवाओं का प्रवाह दोनों दिशाओं में होने काफी गुंजाइश है, और व्यापार को अधिक पारस्परिक बनने की प्रक्रिया में है।

निष्पक्ष और संतुलित व्यापार सुनिश्चित करने के लिए अमेरिका के लिए अपने सभी भागीदारों के साथ कार्य करना महत्वपूर्ण है। हम लगातार व्यापार घाटे के प्रति चिंतित हैं, जिसमें भारत के साथ व्यापार शामिल है। हम सुधार एजेंडा, बाजार पहुंच, और बौद्धिक संपदा संरक्षण को और बढ़ावा देना जारी रखने के लिए भारत के कदमों का स्वागत करते हैं। हम भारत के साथ व्यापार और निवेश विवादों को तेजी से हल करने के लिए कार्य करना चाहते हैं। हमारे दृष्टिकोण में पूरी तरह मुक्त और निष्पक्ष व्यापार, भारत के अनवरत दीर्घकालिक विकास दर में सुधार करने के प्रधानमंत्री मोदी के प्रयासों को बढ़ाने में सहयोग करेगा। इस संबंध में वर्ल्ड बैंक की ईज ऑफ डूइंग बिजनेस सूची में भारत को और ऊपर ले जाने की प्रधानमंत्री की दृढ़ता प्रेरणादायक है।

‘‘अमेरिका फर्स्ट’’ और ‘‘मेक इन इंडिया’’ में विरोधाभास नहीं है। बल्कि एक-दूसरे के बाजारों में निवेश करना पारस्परिक रूप से फायदेमंद होगा – यह हमारे आर्थिक आदान-प्रदान और व्यापार की मात्रा में वृद्धि, उभरती प्रौद्योगिकियों में सहयोग का मार्गदर्शन और दोनों देशों में रोजगार पैदा करेगा।

लेकिन मुझे आगे बढ़ने दें तथा सुझाव दें कि हमारे आर्थिक संबंध के बारे में रणनीतिक चश्मा लगाने का समय है, ठीक वैसे जैसे हमने रक्षा संबंध के लिए किया है। कई अमेरिकी कंपनियों ने चीनी क्षेत्र में व्यापार करने के लिए बढ़ती कठिनाइयों की सूचना दी है। इसी तरह से वहां कुछ कंपनियां अपने संचालन को कम कर रही हैं, जबकि अन्य कंपनियां वैकल्पिक बाजारों की तलाश कर रही हैं।

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी उद्यमों का वैकल्पिक केंद्र बनने के लिए भारत व्यापार और निवेश के माध्यम से रणनीतिक अवसरों को प्राप्त कर सकता है। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा पहले ही शुरू की गए आर्थिक व नियामक सुधार में तेजी यह सुनिश्चित करेगी कि भारत को बढ़ती कुशलता, पारदर्शिता के साथ नियामक बाजार के रूप में प्रदर्शित करने में मदद मिलेगी। यह विकास एवं उन्नति को और अधिक प्रोत्साहन देगा। जारी सुधार और व्यापार उदारीकरण भारतीय उत्पादकों को अधिक आसानी से वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का हिस्सा बनने के भी योग्य बनाएगा, फलस्वरूप तेजी से रोजगार पैदा होंगे।

द्विपक्षीय आर्थिक संबंध और भारत को अमेरिकी उद्यमों के लिए क्षेत्रीय केंद्र बनाने के कई फायदे हैं। हमने हाल में हैदराबाद के ग्लोबल आंत्रप्रेन्योरशिप समिट में महत्वपूर्ण और सकारात्मक प्रभाव देखा है, जो कि देश की अर्थव्यवस्था के नवोन्मेष के लिए योग्य वातावरण है। अमेरिका उद्यमिता और नवोन्मेष का अगुवा है, तथा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत के साथ पहले से व्यापक संबंध हैं। अमेरिकी व्यापार और निवेश के लिए भारत के बाजारों का खुलना बहुत सी उभरतीय प्रौद्योगिकियों पर हमारे सहयोग को प्रोत्साहन देगा, जिससे हमारी अर्थव्यवस्था को संरक्षण मिलेगा, इसमें आधुनिक उत्पादन और साइबर सुरक्षा शामिल है।

अधिक अमेरिकी व्यापार और निवेश एक मजबूत बौद्धिक संपदा संरक्षण वातावरण से संबद्ध है, यह पूंजी और बौद्धिक ज्ञान को साझा करने के बढ़ते प्रवाह को प्रोत्साहित करेगा। प्रौद्योगिकीय रूपांतरण को लगातार उन्नत बनाने की जरूरत होती है, यह तब होती है जब देश अबाधित अंतर्राष्ट्रीय डेटा और आर्थिक प्रवाह में शामिल होते हैं।

अमेरिकी वस्तुओं और सेवाओं के लिए बढ़ता खुलापन, तथा अमेरिकी कंपिनयों की विस्तारित उपस्थिति बेहतर ढांचे एवं समग्र संपर्क में निजी क्षेत्र के निवेश को प्रोत्साहित करेगा। उदाहरण के रूप में अमेरिकी कंपनियों के पास नई प्रौद्योगिकियां हैं जो भारत के देशभर में 100 स्मार्ट सिटीज बनाने के महत्वाकांक्षी लक्ष्य को प्राप्त करने में सहयोग कर सकती हैं। इसके अतिरिक्त, एक अमेरिकी संयुक्त उद्यम भारतीय रेलवे के आधुनिकीकरण के लिए लोकोमोटिव्स का उत्पादन कर रहा है, जो वैश्विक उत्सर्जन के मानको को पूरा करता है। और नागरिक उड्डयन एक और महत्वपूर्ण क्षेत्र है जहां एक बढ़ती भागीदारी हमारी दोनों अर्थव्यवस्थाओं को आगे बढ़ाने में मदद करेगी।

हमारे आर्थिक संबंधों में जोरदार बढ़ोत्तरी निश्चित रूप से व्यापक और गहरी दीर्घकालिक अमेरिकी प्रतिबद्धता के साथ अमेरिका-भारत रिश्ते में अधिक स्थायित्व प्रदान करेगी। यह हमारे बढ़ते रक्षा और आतंकवादरोधी भागीदारी का पूरक होगा, और इसके मार्ग में पैदा होने वाली किसी भी पॉलिसी मतभेदों को नियंत्रित करता है।

इस स्तंभ का अंतिम बिंदु है हमारे आर्थिक रिश्ते का एक रणनीतिक दृष्टिकोण, जो अमेरिका-भारत मुक्त व्यापार समझौते के लिए रोडमैप बनाने में मदद कर सकता है। निश्चित रूप से हमें उस आकांक्षा को पूरा करने के लिए लंबा रास्ता तय करना है, और इसके बीच में कई कदम उठाने होंगे। लेकिन हमें अपने ट्रेड पॉलिसी फोरम और समझ बढ़ाने, भरोसा पैदा करने और समस्याओं के हल के लिए अपने कमर्शियल डायलॉग के उपयोग के रचनात्मक रास्ते तलाश करने चाहिए। हमारे अनुभव और उच्च प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ और रणनीतिक भागीदारी के अगले कदम, हम जहां जाना चाहते हैं वह विजन, आज के व्यापार और निवेश मतभेदों को दूर करने में मदद कर सकते हैं। इसके साथ ही अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों को संकेत दे सकते हैं कि भारत उद्यमों के लिए पूरी तरह खुला है।

ऊर्जा और पर्यावरण

तीसरा स्तंभ ऊर्जा और पर्यावरण पर बढ़ता रणनीतिक सहयोग है। भारत की अर्थव्यवस्था का अनुमानित विकास, जनसंख्या का बढ़ता आकार, मध्यवर्ग का उदय, तथा इसकी जमीन का शहरीकरण, आने वाले वर्षों में इसके सतत और कुल विकास के लिए भारत की ऊर्जा जरूरतें महत्वपूर्ण हैं।

भारत से व्यापक ऊर्जा भागीदारी पेश करने के लिए अमेरिका का विशेष स्थान है। इसमें ऊर्जा का हर रूप शामिल है- कोयला, क्रूड ऑयल, प्राकृतिक गैस; और परमाणु ऊर्जा; इसके साथ-साथ प्रौद्योगिकी संबंधी स्वच्छ जीवाश्म ईंधन, स्मार्ट ग्रिडें, ऊर्जा भंडारण, और नवीकरणीय संसाधन। दरअसल, गत वर्ष अमेरिका ने भारत को क्रूड ऑयल की अपनी पहली बड़ी शिपमेंट भेजी है। अमेरिका सेवाओं, बुनियादी ढांचे, और प्रौद्योगिकी में भी सहयोग कर सकता है। जो ऊर्जा और ऊर्जा सुरक्षा को उन्नत करने वाले घरेलू स्रोतों को और अधिक विकसित करने के लिए भारत के प्रयासों के लिए आवश्यक है।

अमेरिका-भारत रणनीतिक ऊर्जा भागीदारी इस वर्ष की शुरुआत में मंत्रिस्तर पर आयोजित की जाएगी। हमें एनर्जी सेक्रेटरी पेरी के भारत में स्वागत की प्रतीक्षा है। बिजली और ऊर्जा कुशलता पर हमारा संयुक्त रूप से कार्य करना महत्वपूर्ण है। जैसे कि भारत अपने विस्तारित पावर ग्रिड में स्थायित्व लाने का प्रयास कर रहा है, ओवर लोडेड ट्रांसमिशन और वितरण प्रणाली की जरूरतों को पूरा करने के लिए अमेरिकी कंपिनयां प्रौद्योगिकी और विशेषज्ञता पेश कर रही हैं। इसके अतिरिक्त हम नीतियों के प्रकारों, नियमन, तथा वित्तीय निवेश में सहयोग कर रहे हैं जो टिकाऊ और लाभकारी ग्रिड के विकास में मदद करेगा।

समुद्र आधारित अर्थव्यवस्था (ब्लू इकोनोमी) के प्रति प्रधानमंत्री मोदी की प्रतिबद्धता के अनुरूप, हमारा पर्यावरणीय सहयोग महासागरों और समुद्री क्षेत्रों तक फैला है। इसमें समुद्री जैव-विविधता पर वैज्ञानिक आदान-प्रदान, और खनन और समुद्री प्रदूषण पर सहयोग शामिल है। यह सभी हमें आने वाले दशकों में मत्स्य-पालन जारी रखने और तटीय समुदायों की मदद करेंगे।

विज्ञान, प्रौद्योगिकी, और स्वास्थ्य

हमारी भागीदारी का चौथा स्तंभ टिकाऊ और हमारे लोगों के कल्याण के लिए समावेशी विकास पर केंद्रित है। इसमें विज्ञान, प्रौद्योगिकी, और स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण कार्य शामिल है। हमारे अमेरिका-भारत विज्ञान और प्रौद्योगिकी निधि ने बहुत सी नवप्रवर्तनशील परियोजनाओं में मदद की है, इसमें अग्रिम स्वास्थ्य देखभाल, पर्यावरण सुधार, और कृषि आधुनिकीकरण वाली परियोजनाएं शामिल हैं। और पृथ्वी से परे अंतरिक्ष में नासा और इसरो के वैज्ञानिक यह प्रदर्शित करते हुए अक्सर सहयोग करते हैं- कि वास्तव में हमारी भागीदारी की कोई सीमा नहीं है।

स्वास्थ्य संबंधी मुद्दे, विशेष रूप से महत्वपूर्ण साझा जिम्मेदारी हैं, न केवल हमारे लोगों के स्वास्थ्य और सुरक्षा पर उनके प्रत्यक्ष प्रभाव की वजह से, बल्कि उनकी आर्थिक उत्पादकता और समग्र सामाजिक कल्याण पर अप्रत्यक्ष प्रभाव के कारण। इसीलिए हम बीमारियों को नियंत्रित करने के लिए नए रास्तों की तलाश कर रहे हैं। हमने रोटावायरस के लिए संयुक्त रूप से पहला स्वदेशी भारतीय टीका विकसित किया है, और अब तपेदिक (ट्यूबरक्लोसिस), डेंगू, और अन्य उभरती खतरनाक वैश्विक बीमारियों के लिए टीका विकसित करने के लिए सहयोग कर रहे हैं। हम ग्लोबल हैल्थ सिक्यूरिटी एजेंडा पर भी कार्य कर रहे हैं, जिसमें रोगाणुरोधी प्रतिरोध (एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस) तथा बीमारी जांच को कारगर बनाने, रोकथाम करने, और महामारियों से लड़ने के लिए भी कार्य कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त, हमारा स्वास्थ्य एजेंडा एचआईवी की जटिल समस्या के साथ-साथ संक्रामक रोगों के बढ़ते बोझ का समाधान करता है।

क्षेत्रीय सहयोग

हमारी रणनीतिक भागीदारी के निर्माण में अंतिम स्तंभ है- स्थायित्व और कल्याण को बढ़ावा देने के लिए क्षेत्रीय सहयोग। हम सहयोग वाले कुछ क्षेत्रों को संक्षिप्त रूप से रेखांकित करते हैं।

पहला है अफगानिस्तान, जहां शांति, सुरक्षा, और समृद्धि को प्रोत्साहन देने में हमारे दोनों के गहरे हित है। हमारे नेता अफगानिस्तान की नेशनल यूनिटी गवर्नमेंट को सहयोग करने और उस देश के लोकतांत्रिक संस्थानों के निर्माण में सहायता करने हेतु प्रतिबद्ध हैं। हम प्रत्येक अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण और भविष्य के लिए पर्याप्त संसाधनों का निवेश कर रहे हैं। यह प्रयत्न न केवल क्षेत्रीय विकास और स्थिरता को बढ़ावा देते हैं, बल्कि आतंकवादियों के सुरक्षित ठिकानों को समाप्त करने में भी सहायता करते हैं।

हमारे सहयोग का दूसरा क्षेत्र है- इस क्षेत्र में अन्य समान विचार वाले देशों के साथ बहुपक्षीय गतिविधियां, जिनमें जापान और आस्ट्रेलिया शामिल हैं। हम पहले ही जापान मालाबार नौसैनिक अभ्यास कर रहे हैं, और हमारे त्रिपक्षीय डॉयलाग की संभावनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। नियम-आधारित हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती समृद्धि और सुरक्षा के लिए अपने दृष्टिकोण पर बातचीत करने के लिए दस सालों में पहली बार हमने आस्ट्रेलिया के साथ चतुर्पक्षीय बातचीत आयोजित की। हमें बहुपक्षीय समूहों का विकास जारी रखना चाहिए, जैसे कि हम अपने सभी लोकतांत्रिक भागीदारों के साथ सहयोग के अवसरों की तलाश करते रहते हैं।

इसी तरह से, हमें दक्षिण एशिया के अंतर्गत संपर्क को प्रोत्साहन देने के प्रयास बढ़ाने चाहिए, जो आर्थिक रूप से दुनिया में कम से कम एकीकृत क्षेत्रों में एक है। अमेरिका पहले इसकी खोज में है कि हम इस क्षेत्र में कैसे राष्ट्रीय बुनियादी परियोजनाओं में अपने सहायता कार्यक्रमों का लाभ ले सकते हैं। हमें क्षेत्रीय बुनियादी परियोजनाओं के वित्तपोषण पर भारत, अन्य देशों और द्विपक्षीय विकास बैंकों के साथ भी सहयोग करना चाहिए।

एक आखिरी क्षेत्र है हिंद-प्रशांत क्षेत्र में मानवीय सहायता और आपदा राहत। किसी आपदा के लिए प्रभावी राहत कार्य नागरिक-सैनिक सहयोग की जरूरत होती है जिसकी योजना बनाई गई है तथा उसका अभ्यास और उपाय किए गए हैं। अमेरिका और भारत इस कार्य में अलग-अलग क्षमताओं का उपयोग करते हैं और आपदा के समय मिलकर कार्य करने से लाभान्वित हो सकते हैं।

निष्कर्ष

कुल मिलाकर अमेरिका-भारत रणनीतिक भागीदारी के लिए बहुत महत्वाकांक्षी एजेंडा है। आज की अशांत दुनिया में, एक दृढ़ता है और साझेदारी की दृढ़ता हमेशा रहनी चाहिए। मैं सच्चाई से विश्वास करता हूं कि यह अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में किसी भी रिश्ते की तरह महत्वपूर्ण है- जो अवसर हमारे पास हैं और हिंद-प्रशांत क्षेत्र और उसके परे होने वाले संभावित प्रभाव दोनों ही रूप में। हालांकि भारत और अमेरिका दोनों अपनी स्वतंत्रता और संप्रभुता को पोषित कर रहे हैं।  हमारी भागीदारी का असली मूल्य यह है कि हमारे लोगों की सुरक्षा और समृद्धि के लिए वैश्विक मामलों को सकारात्मक रूप से प्रभावित और सबसे बड़ी आकांक्षाओं को प्राप्त कर सकने में सक्षम बना सकती है। निश्चित रूप से यह होगा, हमें मित्र के रूप में सम्मान, विश्वास, स्वीकृति, भरोसा, लचीलापन और स्थिरता के साथ अपने कार्य करने चाहिए।

राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत को ‘‘सच्चा दोस्त’’ कहा है। और प्रधानमंत्री मोदी ने प्रधानमंत्री वाजपेयी का कथन दोहराया है जिसमें उन्होंने हमारे देशों को ‘‘स्वाभाविक मित्र’’ रूप में वर्णित किया है। अब यह हम पर निर्भर है कि आगे इस शब्दावली को यथार्थ रूप प्रदान करें। हमें एक मजबूत और टिकाऊ होने के साथ लचीली और अनुकूल भागीदारी का निर्माण करना चाहिए। आइए अपने सामने अवसरों को ग्रहण करें, ताकि भावी पीढ़ियां इस समय को अमेरिका-भारत संबंधों के वास्तविक रूपांतरण के रूप में देखें।

बहुत धन्यवाद।